मंगलवार, 1 अप्रैल 2025

सांस्कृतिक साम्राज्यवाद और हमारा संविधान


सांस्कृतिक साम्राज्यवाद एक ऐसा विचारधारात्मक दृष्टिकोण है, जिसमें एक समाज या संस्कृति अपनी मान्यताओं, मूल्यों, और जीवनशैली को अन्य समाजों पर थोपता है, विशेष रूप से उन समाजों पर जिनकी अपनी अलग पहचान और सांस्कृतिक धरोहर होती है। यह परंपरागत रूप से उन देशों या समाजों द्वारा लागू किया जाता है जिनके पास आर्थिक, सैन्य, या तकनीकी शक्ति होती है, और जो अपनी सांस्कृतिक शक्ति का विस्तार करते हैं। 


हमारा संविधान भारतीय समाज की विविधता को सम्मान देने का प्रयास करता है। भारतीय संविधान में सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषाई विविधता के प्रति सहिष्णुता और सम्मान का मूल विचार समाहित है। यह संविधान भारतीय समाज की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को स्वीकार करता है और इसे संरक्षित करने का प्रावधान करता है। 

### सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का प्रभाव:

1. **संस्कृति की हानि**: सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का मुख्य प्रभाव समाजों की अपनी पारंपरिक संस्कृति और मान्यताओं पर पड़ता है। पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव भारतीय समाज पर भी देखा गया है, जहां कुछ भारतीय परंपराएं और रीति-रिवाज धीरे-धीरे समाप्त हो गए हैं या बदल गए हैं।

2. **वैश्वीकरण का प्रभाव**: वैश्वीकरण के साथ, पश्चिमी मीडिया, फैशन, खानपान, और जीवनशैली भारतीय समाज में प्रचलित हुई हैं। यह कहीं न कहीं भारतीय सांस्कृतिक पहचान को प्रभावित कर रहा है। लेकिन भारतीय संविधान में यह सुनिश्चित किया गया है कि यह बदलाव एक स्वैच्छिक प्रक्रिया हो, न कि एक थोपे गए साम्राज्यवादी प्रभाव के रूप में।

3. **धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान**: भारतीय संविधान का उद्देश्य सभी धर्मों, भाषाओं, और संस्कृतियों के प्रति सम्मान दिखाना है। यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी संस्कृति दूसरों पर हावी न हो। अनुच्छेद 29 और 30 में सांस्कृतिक और भाषाई अधिकारों की रक्षा की गई है।

### संविधान का सांस्कृतिक साम्राज्यवाद से मुकाबला:

1. **धार्मिक स्वतंत्रता**: भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्थाओं के पालन और प्रचार की स्वतंत्रता प्रदान करता है (अनुच्छेद 25-28)। यह सुनिश्चित करता है कि कोई एक धार्मिक या सांस्कृतिक विचारधारा पूरे समाज पर थोपे नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को अपनी पहचान और विश्वास की स्वतंत्रता हो।

2. **सांस्कृतिक अधिकार**: अनुच्छेद 29 और 30 में भारतीय नागरिकों को अपने सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकारों का संरक्षण प्रदान किया गया है। यह प्रावधान किसी भी सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को रोकने में सहायक होता है, क्योंकि यह विविधता को बढ़ावा देता है और एकजुटता की भावना को प्रोत्साहित करता है।

3. **संविधान में विविधता का सम्मान**: भारत की विविधता को देखते हुए, संविधान ने हर नागरिक को अपनी संस्कृति और पहचान को बनाए रखने का अधिकार दिया है। सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ यह एक मजबूत रक्षात्मक ढांचा है।

### निष्कर्ष:
भारत का संविधान सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के खिलाफ एक प्रभावी सुरक्षा कवच है। यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय समाज अपनी विविधता और पारंपरिक संस्कृति को बनाए रखे, जबकि एक साथ वैश्वीकरण और आधुनिकता का स्वागत भी किया जा सके। संविधान के प्रावधान भारतीय संस्कृति और पहचान को संजोने और सम्मान देने के उद्देश्य से कार्य करते हैं।

**भारत के मूल निवासी और संविधान में उनकी जगह**

भारत की जनसंख्या में विभिन्न जातियाँ, समुदाय, और समूह शामिल हैं, जिनमें कई जातियाँ और संस्कृतियाँ ऐसी हैं जो सदियों से भारतीय उपमहाद्वीप में निवास करती हैं। इन्हें "मूल निवासी" या "आदिवासी" कहा जाता है। आदिवासी समुदायों की अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, परंपराएँ, और जीवनशैली होती है, जो उन्हें अन्य समाजों से अलग करती है। भारतीय संविधान ने इन समुदायों के अधिकारों और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रावधान किए हैं। 

### **मूल निवासी (आदिवासी) की परिभाषा**:
भारत में "मूल निवासी" (या आदिवासी) ऐसे लोग होते हैं, जो भारत के विभिन्न हिस्सों में प्राचीन काल से रहते आए हैं और जिनकी अपनी विशिष्ट संस्कृति, भाषा, और परंपराएँ होती हैं। इन्हें संविधान में **"जनजाति"** (Tribes) के रूप में पहचाना जाता है। भारतीय संविधान ने आदिवासियों के विशेष अधिकारों और संरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए कुछ विशेष प्रावधानों की स्थापना की है।

### **संविधान में आदिवासियों के अधिकारों की सुरक्षा**:
भारतीय संविधान ने आदिवासियों की सामाजिक, सांस्कृतिक, और आर्थिक स्थिति की सुरक्षा और उन्नति के लिए कई प्रावधान किए हैं, जिनका उद्देश्य उनके अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें मुख्यधारा में लाना है। ये प्रावधान निम्नलिखित हैं:

1. **अनुच्छेद 15 (भेदभाव से संरक्षण)**:
   अनुच्छेद 15 में यह प्रावधान है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ जाति, धर्म, लिंग, या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा। आदिवासी समुदाय के सदस्य इस प्रावधान से लाभान्वित होते हैं, क्योंकि इसका उद्देश्य उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ नहीं होने देना है।

2. **अनुच्छेद 46 (आदिवासी समुदायों की उन्नति)**:
   यह अनुच्छेद विशेष रूप से आदिवासी समुदायों के उत्थान के लिए है। इसमें कहा गया है कि राज्य उनके शिक्षा और सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए विशेष प्रयास करेगा ताकि वे सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से समृद्ध हो सकें। यह प्रावधान आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।

3. **अनुच्छेद 330 और 332 (चुनाव में प्रतिनिधित्व)**:
   आदिवासी समुदायों के लिए भारतीय संविधान में निर्वाचन क्षेत्रों में आरक्षित सीटें दी गई हैं। अनुच्छेद 330 के तहत लोकसभा में आदिवासी क्षेत्रों के लिए आरक्षित सीटें हैं, और अनुच्छेद 332 के तहत राज्य विधानसभा में भी आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षित सीटें निर्धारित की गई हैं। यह प्रावधान आदिवासियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान करता है।

4. **अनुच्छेद 244 और 244(1) (आदिवासी क्षेत्रों का विशेष प्रशासन)**:
   अनुच्छेद 244 और 244(1) में आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। यह प्रावधान "आदिवासी क्षेत्रों" (Scheduled Areas) के प्रशासन के लिए राज्य सरकारों को विशेष अधिकार प्रदान करता है। इसमें "पंचायती राज" और "स्थानीय स्वशासन" संस्थाओं की स्थापना की बात भी की गई है, जो आदिवासी क्षेत्रों में सरकारी नीतियों और योजनाओं को लागू करने में मदद करती हैं।

5. **आदिवासी क्षेत्रों का संरक्षण - अनुसूचित क्षेत्रों का निर्धारण**:
   भारतीय संविधान में **अनुसूचित क्षेत्रों** और **आदिवासी क्षेत्रों** के लिए विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है। अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) और अनुसूचित क्षेत्रों (Scheduled Areas) को विशेष सुरक्षा प्राप्त है। संविधान के अनुसार, सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि इन क्षेत्रों में आदिवासियों के अधिकारों का उल्लंघन न हो और उनके संसाधनों का शोषण न किया जाए।

6. **संविधान (87वां संशोधन) अधिनियम, 2003**:
   इस संशोधन के द्वारा आदिवासी क्षेत्रों में कुछ और सुधार लाए गए थे, जिसमें उनके पारंपरिक अधिकारों का सम्मान करते हुए उनके उत्थान के लिए नई योजनाओं का प्रस्ताव किया गया।

### **संविधान में आदिवासियों के लिए विशेष प्रावधानों के उद्देश्य**:
1. **सामाजिक न्याय और समानता**: आदिवासी समाज को मुख्यधारा में शामिल करने और उनके सामाजिक और आर्थिक समानता की दिशा में काम करना संविधान का मुख्य उद्देश्य है। ये प्रावधान आदिवासियों को समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने की दिशा में सहायक हैं।

2. **सांस्कृतिक संरक्षण**: संविधान आदिवासी समुदायों की सांस्कृतिक धरोहर और पहचान के संरक्षण का प्रयास करता है। इसके अंतर्गत आदिवासियों को अपनी परंपराओं, भाषा, और रीति-रिवाजों को बनाए रखने की स्वतंत्रता मिलती है।

3. **आर्थिक विकास**: आदिवासी समुदायों के लिए विशेष आर्थिक योजनाओं का प्रावधान किया गया है ताकि वे गरीबी और आर्थिक पिछड़ेपन से बाहर निकल सकें। विशेष रूप से आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, और आधारभूत संरचना में सुधार किया जाता है।

4. **भूमि अधिकार**: आदिवासियों की भूमि के अधिकारों की सुरक्षा के लिए विभिन्न कानून बनाए गए हैं। जैसे, **भूमि अधिग्रहण कानून** में आदिवासियों की भूमि को बिना उनकी सहमति के न लेने की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा, आदिवासी क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना और संसाधनों का शोषण आदिवासियों की सहमति से ही करने की शर्त रखी गई है।

### **निष्कर्ष**:
भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए कई विशेष प्रावधान किए गए हैं ताकि उनकी पहचान, संस्कृति और अधिकारों का संरक्षण किया जा सके। हालांकि, आदिवासी समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनका सशक्तिकरण एक निरंतर प्रक्रिया है, जिसमें संविधान ने मार्गदर्शन और सुरक्षा प्रदान की है। यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि आदिवासियों के अधिकारों का उल्लंघन न हो और उनका समाज में पूर्ण समावेश हो।

**भविष्य में भारत की राजनीति परिवर्तन की संभावनाएं**

भारत की राजनीति में भविष्य में कई प्रकार के परिवर्तन संभव हो सकते हैं, जिनका असर भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ेगा। ये परिवर्तन विभिन्न सामाजिक, आर्थिक, और राजनीतिक कारकों द्वारा प्रेरित हो सकते हैं। भारतीय राजनीति में बदलाव की संभावनाओं को समझने के लिए कुछ मुख्य तत्वों पर विचार किया जा सकता है:

### 1. **लोकतंत्र और चुनाव प्रणाली में सुधार**:
   - **इलेक्टोरल रिफॉर्म्स**: भारतीय चुनाव प्रणाली में सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। चुनावों में पारदर्शिता बढ़ाने, पैसे के प्रभाव को कम करने, और चुनावी प्रक्रिया को और अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लिए सुधार हो सकते हैं। जैसे, **इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVMs)** की सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर अधिक ध्यान दिया जा सकता है।
   - **राजनीतिक दलों के वित्तीय सुधार**: चुनावी चंदे के पारदर्शिता में सुधार और काले धन को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। पार्टी फंडिंग के मुद्दे पर सुधार से चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता बढ़ सकती है।
   
### 2. **केंद्रीकरण और राज्य-संघ संबंध**:
   - **राज्य का अधिक सशक्तिकरण**: संघीय व्यवस्था में बदलाव और राज्यों को अधिक स्वायत्तता देने की संभावना है। यह राज्यों को उनकी प्राथमिकताओं के आधार पर नीतियां बनाने का अवसर देगा और वे केंद्र से ज्यादा स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकेंगे। विशेष रूप से **राज्य विधानसभा चुनावों** में राज्य-विशिष्ट मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण बन सकते हैं।
   - **केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय**: यदि केंद्र और राज्यों के बीच अच्छे समन्वय को बढ़ावा मिलता है तो यह शासन प्रणाली को अधिक प्रभावी बना सकता है। भविष्य में केंद्र-राज्य संबंधों में अधिक लचीलेपन और सहयोग की उम्मीद की जा सकती है।

### 3. **सामाजिक और जातिगत समीकरणों में बदलाव**:
   - **सामाजिक न्याय और समानता के लिए संघर्ष**: सामाजिक न्याय की दिशा में किए गए प्रयासों में बदलाव आ सकता है। विशेषकर **जातिवाद** और **धार्मिक असहमति** के मुद्दे को हल करने के लिए नए दृष्टिकोण सामने आ सकते हैं। भारत में सामाजिक और जातिगत समीकरणों का एक बड़ा प्रभाव राजनीतिक निर्णयों पर पड़ता है, और भविष्य में यह समीकरण समय के साथ विकसित हो सकते हैं।
   - **महिला और युवा सशक्तिकरण**: महिलाओं और युवाओं के बीच राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि हो सकती है। यह बदलाव पारंपरिक राजनीतिक संरचनाओं को चुनौती दे सकता है और महिलाओं की भूमिका बढ़ सकती है, साथ ही युवा वोटर्स का प्रभावी हस्तक्षेप भी राजनीतिक वातावरण को प्रभावित कर सकता है।

### 4. **नया नेतृत्व और विचारधाराएं**:
   - **नई पीढ़ी का नेतृत्व**: भारतीय राजनीति में भविष्य में नई पीढ़ी के नेताओं का उदय हो सकता है, जो पुराने नेताओं की तुलना में अधिक प्रौद्योगिकी-सक्षम और सामाजिक दृष्टि से संवेदनशील होंगे। यह बदलाव पारंपरिक राजनीति से हटकर आधुनिक दृष्टिकोणों को जन्म दे सकता है।
   - **विचारधाराओं का विकास**: आने वाले समय में नए राजनीतिक विचार और आंदोलनों का जन्म हो सकता है जो भारत की विविधता और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर आधारित हो सकते हैं। इससे परंपरागत विचारधाराओं को चुनौती मिल सकती है।

### 5. **राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन और विरोधी ध्रुवीकरण**:
   - **गठबंधन राजनीति का भविष्य**: भारत की राजनीति में गठबंधन दलों की भूमिका भविष्य में बढ़ सकती है, जहां विभिन्न क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों के बीच समझौते और गठबंधन बन सकते हैं। हालांकि, यह भी संभव है कि बड़े दलों का एकदलीय शासन और मजबूत हो, जैसा कि वर्तमान में **भारतीय जनता पार्टी (BJP)** और **कांग्रेस** जैसे दलों के लिए देखा जा रहा है।
   - **विरोधी ध्रुवीकरण**: आने वाले समय में विपक्ष के दलों के बीच एकजुटता और सहयोग की संभावना है, जिससे मजबूत विपक्षी फ्रंट बन सकता है। हालांकि, अगर विरोधी दलों के बीच समन्वय नहीं होता है, तो राजनीति में अधिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक अस्थिरता हो सकती है।

### 6. **प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया का प्रभाव**:
   - **सोशल मीडिया और राजनीति**: सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव भारतीय राजनीति में गहरे बदलाव ला सकता है। सोशल मीडिया के माध्यम से जनता के विचारों को सीधे नेताओं तक पहुँचने का अवसर मिल रहा है, जिससे पारंपरिक प्रचार-प्रसार के तरीकों में बदलाव आ सकता है।
   - **डिजिटल राजनीति**: डिजिटल भारत के तहत, प्रौद्योगिकी और डेटा का उपयोग अधिक सशक्त रूप में हो सकता है। इससे राजनीतिक फैसलों में पारदर्शिता और नागरिकों की सहभागिता बढ़ सकती है।

### 7. **आर्थिक और वैश्विक दृष्टिकोण से बदलाव**:
   - **आर्थिक नीति में परिवर्तन**: भारत की आर्थिक नीति में बदलाव आ सकता है, जिससे नए क्षेत्र जैसे डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा, और नवाचार को बढ़ावा दिया जाएगा। यह आर्थिक विकास और राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।
   - **वैश्विक संबंधों में बदलाव**: भारत की विदेशी नीति और वैश्विक रिश्तों में बदलाव हो सकता है, विशेष रूप से आसियान देशों, अमेरिका, और अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ। भारत की भूमिका वैश्विक मंच पर बढ़ सकती है, जो देश की आंतरिक राजनीति को भी प्रभावित करेगा।

### 8. **संविधान और न्यायपालिका में बदलाव**:
   - **संविधान में सुधार**: भारतीय संविधान में कुछ आवश्यक बदलाव किए जा सकते हैं, विशेषकर सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, और समानता के मुद्दों को ध्यान में रखते हुए। संविधान की खामियों को सुधारने के लिए नए संशोधन हो सकते हैं।
   - **न्यायपालिका का सशक्तिकरण**: न्यायपालिका का और अधिक सशक्त होना भारतीय राजनीति में बदलाव ला सकता है, खासकर जब यह विधायिका और कार्यपालिका से असहमत होती है।


निष्कर्ष:
भारत की राजनीति में भविष्य में कई संभावित परिवर्तन हो सकते हैं, जो समाज के विभिन्न पहलुओं, वैश्विक प्रभाव, और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से जुड़े होंगे। हालांकि, किसी भी परिवर्तन के लिए समय और परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। भारतीय राजनीति का भविष्य जटिल और बहुसंख्यक हो सकता है, जहां कई विविधताएँ एक साथ विकसित होंगी, लेकिन इसके साथ ही समाज में समन्वय और समानता को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।


भारत और अमेरिका के बीच भविष्य की राजनीति:

भारत और अमेरिका के बीच संबंधों का भविष्य काफी दिलचस्प और विकासशील होगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच रणनीतिक, आर्थिक, और राजनीतिक सहयोग में लगातार वृद्धि हो रही है। वैश्विक परिप्रेक्ष्य में इन दोनों देशों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का एक जटिल मिश्रण होगा, जो क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा। 

आइए, कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर चर्चा करते हैं, जो भविष्य में भारत और अमेरिका के रिश्तों को प्रभावित कर सकते हैं:
 1.आर्थिक और व्यापारिक सहयोग:
   - **व्यापारिक संबंधों में वृद्धि**: भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों में बढ़ोतरी जारी रहेगी। दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के लिए **नई व्यापार नीति**, **नवीनतम प्रौद्योगिकी व्यापार** और **साझेदारी** पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। भारत अमेरिका के लिए एक प्रमुख आर्थिक साझेदार बनता जा रहा है, खासकर **हाई-टेक क्षेत्र**, **सूचना प्रौद्योगिकी**, और **हेल्थकेयर** में।
   - **डिजिटल और नवाचार**: डिजिटल अर्थव्यवस्था और नवाचार में सहयोग बढ़ सकता है, विशेष रूप से **आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI)**, **ब्लॉकचेन**, **बिग डेटा**, और **क्लाउड कंप्यूटिंग** जैसे क्षेत्रों में। अमेरिका और भारत की युवा और तकनीकी रूप से प्रगति करने वाली आबादी को देखते हुए ये क्षेत्र दोनों देशों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच हो सकते हैं।
   - **व्यापार समझौतों पर बातचीत**: भविष्य में दोनों देशों के बीच व्यापार समझौतों और **टैरिफ** पर बातचीत और समझौते हो सकते हैं, जिससे द्विपक्षीय व्यापार और निवेश में वृद्धि हो।

### 2. **वैश्विक राजनीति में साझेदारी**:
   - **वैश्विक शक्तियों के साथ साझेदारी**: अमेरिका और भारत दोनों ही **चीन** को अपने समकक्ष एक प्रमुख प्रतिस्पर्धी मानते हैं। भविष्य में, दोनों देशों के बीच **आर्थिक** और **सैन्य सहयोग** चीन के प्रभाव का मुकाबला करने के लिए बढ़ सकता है। **क्वाड (QUAD)**, जिसमें अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, एक महत्वपूर्ण मंच है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए बन रहा है।
   - **सुरक्षा सहयोग**: अमेरिका और भारत के बीच सुरक्षा सहयोग में वृद्धि हो सकती है। दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यास, हथियारों की आपूर्ति, और सामरिक साझेदारी में सुधार संभव है। **लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA)** जैसे समझौते दोनों देशों के सैन्य संबंधों को और मजबूत करेंगे।
   - **संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संगठनों में सहयोग**: संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन (WTO), और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों में भारत और अमेरिका के बीच समन्वय बढ़ सकता है। भारत की स्थायी सदस्यता के लिए अमेरिका का समर्थन भी महत्वपूर्ण हो सकता है, खासकर **संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद** में।

### 3. **मौलिक मूल्य और लोकतंत्र**:
   - **लोकतांत्रिक साझेदारी**: भारत और अमेरिका दोनों लोकतांत्रिक देश हैं, और उनके बीच एक सामान्य राजनीतिक मूल्य है। यह भविष्य में दोनों देशों के संबंधों को सुदृढ़ करने में मदद कर सकता है, खासकर जब दोनों देशों में लोकतंत्र, स्वतंत्रता, मानवाधिकार, और कानून के शासन जैसे मुद्दों पर समान दृष्टिकोण हो।
   - **आंतरिक राजनीति में बदलाव**: हालांकि दोनों देशों की राजनीतिक प्रणालियाँ अलग हैं, लेकिन भारत और अमेरिका में **राष्ट्रवाद** और **लोकतांत्रिक संघर्ष** के मुद्दे प्रासंगिक हो सकते हैं। दोनों देशों में आंतरिक राजनीति में बदलाव आने पर उनके बाहरी रिश्तों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।

### 4. **जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा**:
   - **सतत विकास और जलवायु परिवर्तन**: जलवायु परिवर्तन को लेकर भारत और अमेरिका के बीच सहयोग बढ़ सकता है, क्योंकि दोनों देशों को इस वैश्विक संकट से निपटने के लिए मिलकर काम करना होगा। अमेरिका के **पेरिस जलवायु समझौते** में वापसी के बाद, भारत और अमेरिका के बीच **हरित ऊर्जा** और **नवीकरणीय ऊर्जा** पर सहयोग की संभावना बढ़ी है।
   - **सामूहिक प्रयास**: दोनों देश मिलकर **क्लाइमेट चेंज** और **पर्यावरण संरक्षण** के लिए प्रयास कर सकते हैं, जैसे कि **सौर ऊर्जा**, **हवा ऊर्जा**, और अन्य हरित प्रौद्योगिकियों में सहयोग।

### 5. **सांस्कृतिक और शिक्षा में संबंध**:
   - **सांस्कृतिक संबंध**: भारत और अमेरिका के बीच सांस्कृतिक और शिक्षा संबंधों में भी वृद्धि हो सकती है। भारतीय छात्रों का अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करना एक बड़ा क्षेत्र है, जो दोनों देशों के लिए सकारात्मक है। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, फिल्म, कला, और साहित्य के क्षेत्र में भी सहयोग हो सकता है।
   - **समाजवाद और विविधता**: भारत और अमेरिका दोनों ही समाज में विविधता को स्वीकार करते हैं, और इसके कारण दोनों देशों के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक संबंधों में समृद्धि हो सकती है। 

### 6. **चीन और रूस के साथ प्रतिस्पर्धा**:
   - **चीन का मुकाबला**: चीन के बढ़ते प्रभाव के कारण भारत और अमेरिका का सहयोग और भी महत्वपूर्ण हो सकता है। दोनों देशों को सामरिक और व्यापारिक दृष्टिकोण से चीन की विस्तारवादी नीतियों का मुकाबला करना होगा। 
   - **रूस के साथ रिश्ते**: हालांकि रूस और भारत के बीच ऐतिहासिक संबंध हैं, लेकिन अमेरिका के साथ मजबूत होने वाले रिश्ते भविष्य में **भारत-रूस संबंधों** को प्रभावित कर सकते हैं। रूस के साथ सैन्य सहयोग और व्यापारिक समझौतों में भी बदलाव हो सकता है।

### 7. **सुरक्षा और साइबर राजनीति**:
   - **साइबर सुरक्षा**: दोनों देशों के बीच **साइबर सुरक्षा** और **सूचना प्रौद्योगिकी** के क्षेत्र में सहयोग बढ़ सकता है, क्योंकि साइबर अपराध और राष्ट्रीय सुरक्षा की नई चुनौतियाँ सामने आ रही हैं। साइबर सुरक्षा, डेटा संरक्षण, और आतंकवाद से निपटने के लिए दोनों देशों को मिलकर काम करना होगा।
   
### निष्कर्ष:
भारत और अमेरिका के बीच भविष्य में राजनीतिक रिश्ते मजबूत हो सकते हैं, विशेषकर वैश्विक और क्षेत्रीय सहयोग, सुरक्षा, व्यापार, और अन्य सामरिक पहलुओं में। हालांकि दोनों देशों के बीच कुछ मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनके साझा हित और समृद्धि के लिए मिलकर काम करने की संभावना अधिक है। भारत और अमेरिका के रिश्तों में वृद्धि से न केवल इन दोनों देशों को लाभ होगा, बल्कि वैश्विक सुरक्षा, आर्थिक विकास और समृद्धि के लिए भी यह महत्वपूर्ण होगा।

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डॉ. लाल रत्नाकर एक प्रसिद्ध चित्रकार और शिक्षाविद् हैं, जो गाजियाबाद के एम.एम.एच. कॉलेज में चित्रकला विभाग के अध्यक्ष रहे हैं। उनकी कला मुख्य रूप से भारतीय नारी के विविध रूपों और उनकी भावनाओं को केंद्र में रखकर रची गई है। उनके चित्रों में नारी को सृजन का प्रतीक माना गया है, जिसमें वह न केवल सुंदरता और श्रृंगार का चित्रण करते हैं, बल्कि उनकी व्यथा, संघर्ष और ग्रामीण जीवन की सादगी को भी उजागर करते हैं।

डॉ. रत्नाकर के चित्रों की खासियत यह है कि वे भारतीय संस्कृति और परंपराओं से गहरे जुड़े हैं। उनके कार्यों में ग्रामीण परिवेश और नारी के आभूषणों व पहनावे का विशेष चित्रण देखने को मिलता है, जो सामाजिक संदर्भों को भी दर्शाता है। वे स्वयं कहते हैं कि नारी उनके लिए सृजन की सबसे सरल और प्रभावशाली अभिव्यक्ति है, और उनके चित्र इस भावना को रंगों और रेखाओं के माध्यम से जीवंत करते हैं। उनकी कला में प्रकृति, पशु-पक्षी और पुरुषों का चित्रण भी कभी-कभी देखने को मिलता है, लेकिन नारी उनकी रचनाओं का मुख्य आधार रही है।

उनके चित्रों को देखकर यह स्पष्ट होता है कि वे अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि से गहरे प्रभावित हैं, और उनकी अंतर्दृष्टि उनकी कला में समय के साथ परिपक्व विचार प्रक्रिया के रूप में झलकती है। उनकी प्रदर्शनियों में अक्सर नारी जीवन की बहुआयामी छवियां प्रस्तुत की जाती हैं, जो दर्शकों को भावनात्मक और दार्शनिक स्तर पर प्रभावित करती हैं।

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शनिवार, 8 फ़रवरी 2025

दयानन्द पांडेय ; ब्राह्मिणवादी विचारों का सजग चेहरा

 भस्मासुर बनाने और निपटाने में भाजपा की कैफ़ियत 

-दयानंद पांडेय 

अरविंद केजरीवाल को भस्मासुर बनाने वाली भाजपा ही थी। यह बात कम लोग जानते हैं। अलग बात है कि इस भस्मासुर को भस्म करने में भाजपा को बहुत समय लग गया। लेकिन ज़रा रुकिए। यह एक फ़ोटो पहले देखिए फिर आगे बात करते हैं। भाजपा को जितना लोग समझते हैं , उतनी है नहीं। एक पुरानी कहावत है कि यह आदमी जितना दीखता है , उस से ज़्यादा धरती के भीतर है। भाजपा वही है। धरती के भीतर कुछ ज़्यादा ही है। भाजपा को  कांटे से कांटा निकालने का पुराना अभ्यास है। धैर्य और टाइमिंग का भी। याद कीजिए कि कांग्रेस को अकेले दम पराजित करना जनसंघ के लिए भी आसान नहीं था। भाजपा के लिए भी नहीं थी। बहुत कंप्रोमाइज और अपमान सही हैं भाजपा ने। छुआछूत का सामना किया है। तब यहां तक पहुंची है। इमरजेंसी के पहले ही जनसंघ ने बहुत आहिस्ता से जय प्रकाश नारायण को अपने पक्ष में मोहित कर लिया। जय प्रकाश नारायण की लंबी सेवा की। संघ परदे के पीछे से उपस्थित था। इस के पहले जनसंघ ने लोहिया को भी साध लिया था। उत्तर प्रदेश में लोहिया पुल से होते हुए ही संविद सरकार बनी। दो बार बनी और जनसंघ उस में शामिल था। चरण सिंह मुख्य मंत्री और जनसंघ के राम प्रकाश गुप्त उप मुख्य मंत्री। पर यह लंबी कहानी नहीं बनी। 

इंदिरा गांधी की तानाशाही से आजिज जय प्रकाश नारायण के साथ जनसंघ पूरी ताक़त से खड़ी हो गई थी। संघ का कवच कुण्डल लिए हुए। एक फ़ोटो इंडियन एक्सप्रेस में छपी थी। पुलिस जय प्रकाश नारायण पर लाठियां बरसा रही है। और जय प्रकाश नारायण पर नानाजी देशमुख बिलकुल छाता बन कर लेटे हुए हैं। पुलिस की लाठियां अपने सीने पर खाते हुए। भूल से भी जो कोई एक लाठी जय प्रकाश नारायण पर पड़ गई होती तो जय प्रकाश नारायण वहीं प्राण छोड़ देते। उन की देह में तब कुछ था ही नहीं। खड़े हो कर भाषण देने लायक़ नहीं थे। कृशकाय देह किसी तरह चल लेती थी। बहुत ज़ोर से बोल नहीं पाते थे। पर इंदिरा गांधी की नाक में दम कर रखा था। इंदिरा ने जब कोई रास्ता नहीं देखा तो जय प्रकाश नारायण को सी आई ए एजेंट कहना शुरू कर दिया। पर राजनारायण की याचिका पर जस्टिस जगमोहन सिनहा ने जनसंघ की लंबी लड़ाई को बहुत छोटा कर दिया। इंदिरा गांधी का चुनाव अवैध घोषित किया। 

इंदिरा ने फिर से चुनाव लड़ने के बजाय तानाशाही की आदत के चलते रातोरात इमरजेंसी लगा दी। यह काला इतिहास है और सभी इस से परिचित हैं। जय प्रकाश नारायण ही नहीं बहुत से लोग जेलों में भर दिए गए। ख़ूब कूटे गए। हज़ारों लोगों के पृष्ठ भाग में लाल मिर्च , लाठी सब हुए। भारी अत्याचार हुए। इस में जनसंघ और संघ के लोग सर्वाधिक थे। भयभीत हो कर सर्वदा नकली संघर्ष के योद्धा वामपंथी तो इमरजेंसी के पक्ष में खड़े हो गए। विभिन्न जेलों में जनसंघियों की दोस्ती समाजवादियों से प्रगाढ़ हुई। इमरजेंसी ख़त्म होने और जेल से बाहर आने के बाद जनता पार्टी बनी। जनसंघ इस में महत्वपूर्ण रूप से उपस्थित हुई। 1977 के चुनाव में कांग्रेस का सफाया हुआ। जनता सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी , लालकृष्ण आडवाणी विदेश और सूचना प्रसारण मंत्री हुए। चरण सिंह की महत्वाकांक्षा और अराजकता ने मोरारजी देसाई सरकार का ढाई बरस में ही पतन करवा दिया। चरण सिंह खुद प्रधान मंत्री बने। बाद में इंदिरा कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी। इंदिरा की हत्या हुई। राजीव प्रधानमंत्री बने। बोफोर्स की हवा में राजीव गांधी उड़ गए। विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधान मंत्री बने। दिलचस्प यह कि भाजपा और वामपंथियों के संयुक्त समर्थन से बने। उत्तर प्रदेश में तभी भाजपा के समर्थन से मुलायम सिंह यादव मुख्य मंत्री बने। गोया भाजपा न विश्वनाथ प्रताप सिंह के लिए सांप्रदायिक थी , न मुलायम के लिए। फिर जैसे इन दिनों भाजपा को रोकने का फ़ैशन और बीमारी है , उन दिनों कांग्रेस को रोकने का फ़ैशन और बीमारी थी। पर भाजपा अपना लक्ष्य साधने में लगी रही। 

आडवाणी की रथ यात्रा निकली और बिहार में रोक कर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया। विरोध में भाजपा ने केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार से और उत्तर प्रदेश में मुलायम सरकार से समर्थन वापस ले लिया। केंद्र में राजीव गांधी सक्रिय हुए। कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधान मंत्री बने। उत्तर प्रदेश में भाजपा की जगह कांग्रेस का समर्थन प्राप्त कर मुलायम मुख्यमंत्री बने रहे। कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अपनी बरबादी का पहला तीर तभी लिया। फिर निरंतर लेती ही गई। इतना कि अब कोई और तीर लेने लायक़ नहीं रही। ख़ैर राजीव गांधी की हत्या , नरसिंहा राव का प्रधान मंत्री बनना। फिर अटल बिहारी वाजपेयी का एन डी ए का प्रधान मंत्री बनना। देवगौड़ा , गुजराल आदि भी आए गए। अटल के शाइनिंग इण्डिया के गर्भपात के  बाद मनमोहन सिंह का प्रधान मंत्री बनना सब कुछ एक सिलसिला सा है। इस के पहले की बात आगे की कहूं एक ब्रेकर है बीच में। अटल बिहारी वाजपेयी जब प्रधान मंत्री थे तब बड़े यत्न से उन्हों ने एक ममता बनर्जी को कांग्रेस से निकाल कर उपस्थित किया। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का कांटा निकालने के लिए। ममता बनर्जी की मां अटल बिहारी वाजपेयी से बहुत बड़ी नहीं थीं , छोटी ही रही होंगी पर ममता का ईगो मसाज करने के लिए ममता बनर्जी के घर जा कर सार्वजनिक रूप से उन की मां का चरण स्पर्श कर रहे थे। क्या तो पश्चिम बंगाल में वामपंथियों को दुरुस्त करने के लिए। भाजपा सीधे वामपंथियों से लोहा लेने में अक्षम पा रही थी। संयोग से नंदीग्राम और सिंगूर हो गया। भाजपा ने ममता को अपने कंधे पर बैठा लिया। गोया भाजपा हाथी हो और ममता शिकारी। वामपंथियों का शिकार करने में ममता बनर्जी सफल हो गईं। भाजपा ने कांटे से कांटा निकाल दिया था। पर ममता बनर्जी सफल हो कर भस्मासुर बन गईं। भाजपा को ही आंख दिखाने लगीं। भाजपा को ही भस्म करने लगी हैं। पर भूल गई हैं भाजपा अपना लक्ष्य पाने के लिए लंबी रेस की क़ायल है। हड़बड़ी नहीं करती। 

ख़ैर अब आगे के दिनों में कांग्रेस को दिल्ली से भी उखाड़ना मुश्किल लगने लगा भाजपा को। जैसे पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम , सिंगूर हुआ था , दिल्ली में टू जी , कोयला , आदि शुरू हो गया। भाजपा फिर सक्रिय हुई। जैसे कभी जनसंघ के समय जे पी मिले थे जनसंघ को , भाजपा ने महाराष्ट्र से अन्ना हजारे खोजा। दिल्ली में रामलीला मैदान सज गया। माहौल कांग्रेस के ख़िलाफ़ बन गया। मिट्टी तैयार थी। भाजपा को अपने ही बीच से एक कुम्हार मिल गया नरेंद्र मोदी। सूपड़ा साफ़ हो गया कांग्रेस का। मोदी प्रधान मंत्री। अब अन्ना आंदोलन के गर्भ से निकले लोगों में एक महत्वाकांक्षी अरविंद केजरीवाल निकला। महत्वाकांक्षी कई थे। किरन बेदी , प्रशांत भूषण , योगेंद्र यादव , आशुतोष , कुमार विश्वास आदि इत्यादि। अन्ना रोकते रहे सब को कि राजनीति कीचड़ है। पर कोई नहीं माना। अन्ना को लात मार कर सब सत्ता पिपासा में लग गए। अरविंद केजरीवाल सब से आगे निकल गया। कांग्रेस की शीला दीक्षित का कांटा निकालने के लिए भाजपा ने अरविंद केजरीवाल की पतंग उड़ा दी। अब जीत के बाद केजरीवाल भी भस्मासुर बन कर उपस्थित था। कमीनगी में भाजपा - कांग्रेस सहित अन्य अनेक राजनीतिक दलों को पानी पिलाते हुए सत्ता का घोड़ा दौड़ाने में अव्वल निकल गया। भस्मासुर बन गया। पर सत्ता और दौलत बहुत जल्दी आदमी को पतन के द्वार पर उपस्थित कर देती है। तानाशाह , झूठा , भ्रष्टाचारी और मक्कार बना देती है। फिर अरविंद केजरीवाल तो भस्मासुर बन गया। पर भ्रष्टाचार की बेल लताएं इस क़दर इस भस्मासुर पर चढ़ गईं , दिल्ली हमारी है कहने की ज़िद इस क़दर चढ़ गई कि मुगलेआज़म का सलीम जैसे कहता है , अनारकली हमारी है की धुन में बदल गई। और दिल्ली वालों का क्या है। उन को जब पता चला कि मुफ्त की सारी रेवड़ियां भाजपा का मोदी भी देगा , पलट गए। मोदी ने कांटे से कांटा निकाल कर अरविंद केजरीवाल को कहीं का नहीं छोड़ा। कंगाल बना दिया। अरविंद केजरीवाल नाम का भस्मासुर निपट गया है। राजनीति शंकर जी का नृत्य नहीं है। सो भस्मासुर को निपटाने में थोड़ा वक़्त तो लगता है। बतर्ज़ हस्तीमल हस्ती प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है। तो क्या अब अगला नंबर पश्चिम बंगाल का है। कभी जो लोग वामपंथियों की दादागिरी से भयाक्रांत थे , अब ममता बनर्जी की दीदीगिरी से वही लोग त्राहिमाम करने लगे हैं। भाजपा इस बार लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की तरह पश्चिम बंगाल में भी धूल चाट गई है। पर अयोध्या के मिल्कीपुर में आज सपा को चारो खाने चित्त कर आगे की राह खोल ली है। बाक़ी उपचुनाव में भी ठीक कर लिया था। आप ने गौर किया कि बात - बेबात भड़कने वाली ममता अप्रत्याशित रूप से इन दिनों ख़ामोशी का अभ्यास करने लगी हैं। तो क्या मुफ़्त में ? 

इस लिए कि शिकारी अपने शिकार पर है। दबे पांव। भस्मासुर को नृत्य के लिए न्यौता देने की तैयारी में है। दिल्ली विजय की ख़ुशी में पार्टी कार्यालय के भाषण में मोदी ने एक मूर्ख और एक धूर्त का ज़िक्र किया है। धूर्त अरविंद केजरीवाल है और मूर्ख राहुल गांधी। धूर्त निपट चुका है। कांग्रेस को चाहिए कि जल्दी से जल्दी अपने मूर्ख से छुट्टी ले। तभी उस का कल्याण है। लेकिन कांग्रेस ऐसा करेगी , मुझे बिलकुल यक़ीन नहीं है। 

बहरहाल यह जो फ़ोटो प्रस्तुत है यह मेरी खोज से नहीं आई है। कांग्रेस के पेड कलमकार सौरभ वाजपेयी खोज कर लाए हैं। कांग्रेस का शोकगीत गाने के लिए , अरविंद केजरीवाल की लानत-मलामत करने के लिए। यह फ़ोटो वह पहले भी क्यों नहीं ले कर उपस्थित हुए। फ़ोटो में तब भाजपा के तब के आचार्य और वोटिंग प्राइम मिनिस्टर लालकृष्ण आडवाणी हैं। उन के आजू - बाजू सुषमा स्वराज , अरुण जेटली। एक तरफ मुरली मनोहर जोशी , वेंकैया , जसवंत सिंह , राजनाथ सिंह भी हैं। दूसरी तरफ अन्ना हजारे , अरविंद केजरीवाल और किरन बेदी हैं। फ़ोटो में अरविंद केजरीवाल , किरन बेदी से किसी रामायण , महाभारत की कथा पर तो नहीं बात कर रहे। जाहिर है कांग्रेस को ध्वस्त करने की रणनीति पर ही बात केंद्रित हैं। इस फ़ोटो में नरेंद्र मोदी का दूर - दूर तक कोई अता - पता नहीं है। क्यों कि उन का पता तब गुजरािचारो का त के मुख्य मंत्री का था। प्रधान मंत्री पद के लिए तब उन की कोई चर्चा भी नहीं थी। बाक़ी कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। क्यों कि भाजपा वन मैन आर्मी या डायनेस्टी की गुफा में जाने से अभी तक वंचित है। लेकिन ढील दे कर पतंग काटने में चैंपियन है। इस ढील का सर्वाधिक ख़ामियाजा कांग्रेस के हिस्से आता है। पर कांग्रेस को इस में आनंद बहुत आता है। कोई करे भी तो क्या करे !




गुरुवार, 19 अक्टूबर 2023

राष्ट्रीय संग्रहालय को साल के अंत तक खाली करने का आदेश,

राष्ट्रीय संग्रहालय को साल के अंत तक खाली करने का आदेश
नया संग्रहालय 2025 तक के लिए निर्धारित नॉर्थ, साउथ ब्लॉक में नया म्यूजियम तैयार होने तक 2 लाख कलाकृतियां रखी जाएंगी - श्यामलाल यादव द्वारा लिखित

नई दिल्ली | अपडेट किया गया: 28 सितंबर, 2023 15:16 IST
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जनपथ, नई दिल्ली पर राष्ट्रीय संग्रहालय। 
राष्ट्रीय संग्रहालय साल के अंत तक शोधकर्ताओं के लिए बंद हो सकता है और इमारत को मार्च 2024 में ध्वस्त किए जाने की संभावना है। नया संग्रहालय, युग युगीन भारत, उत्तर और दक्षिण ब्लॉक में बनेगा, जिसका कब्ज़ा संभवतः होगा मार्च 2025 तक संस्कृति मंत्रालय द्वारा लिया गया।
इंडियन एक्सप्रेस को पता चला है कि संस्कृति मंत्रालय ने राष्ट्रीय संग्रहालय के अधिकारियों को इस साल के अंत तक जनपथ पर मौजूदा इमारत को खाली करने का प्रयास करने के लिए कहा है।
सूत्रों ने कहा कि यदि यह समयसीमा कायम रहती है, तो शोधकर्ता संग्रहालय के प्रदर्शनों तक नहीं पहुंच पाएंगे - यह 2.10 लाख से अधिक कलाकृतियों के संग्रह का लगभग 10 प्रतिशत प्रदर्शित करता है।
सूत्रों ने कहा कि संग्रहालय के अधिकारियों से कहा गया है कि उन्हें साल के अंत तक इमारत खाली कर देनी चाहिए ताकि अगले साल मार्च तक इसे ध्वस्त किया जा सके।

2 सितंबर को संस्कृति मंत्रालय के सचिव गोविंद मोहन के कार्यालय में संग्रहालय के अधिकारियों के साथ एक बैठक में यह निर्णय लिया गया कि “भंडारण के लिए और राष्ट्रीय संग्रहालय के मौजूदा कर्मचारियों के लिए एक उपयुक्त स्थान की पहचान की जानी चाहिए जिसके लिए एक अंतरिक्ष सलाहकार या एक अंतरिक्ष मूल्यांकन कंपनी नियुक्त की जानी चाहिए।


उत्सव प्रस्ताव

बैठक में गोविंद मोहन के अलावा संस्कृति मंत्रालय के चार अधिकारी और राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक बी आर मणि सहित चार अधिकारी शामिल हुए।
इंडियन एक्सप्रेस द्वारा संपर्क किए जाने पर मणि ने टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। गोविंद मोहन को भेजे गए सवालों का जवाब नहीं मिला।

अधिकारियों ने कहा कि संग्रहालय को स्थानांतरित करने के लिए जल्द से जल्द एक रोडमैप और एक कॉन्सेप्ट नोट तैयार किया जाना है। उन्होंने कहा कि वे संग्रहालय की वस्तुओं के भंडारण और मौजूदा संग्रहालय कर्मचारियों के लिए उपयुक्त स्थान की पहचान करने के लिए काम कर रहे हैं।
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संग्रहालय की कलाकृतियों को स्थानांतरित करना गंभीर कार्य है। संस्कृति मंत्रालय द्वारा 15 सितंबर 2014 को एक विशिष्ट दिशानिर्देश दिया गया है, जिसमें कहा गया है: “संग्रहालय की वस्तुओं का स्थानांतरण और परिवहन क्षेत्र में पेशेवर रूप से कुशल लोगों द्वारा किया जाना चाहिए, न कि अकुशल लोगों द्वारा… स्थानांतरण से पहले… विस्तृत स्थिति स्थिति रिपोर्ट देनी चाहिए संरक्षक से लिखित रूप में स्पष्ट राय लेने के बाद तैयार रहें कि वस्तु स्थानांतरित होने लायक है या नहीं।''

राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रागैतिहासिक काल से लेकर समकालीन युग तक की कलाकृतियाँ हैं। वे 5,000 से अधिक वर्षों की भारतीय कला और शिल्प कौशल का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इसकी स्थापना 15 अगस्त, 1949 को राष्ट्रपति भवन में की गई थी और कलाकृतियों को पहली बार लंदन के बर्लिंगटन हाउस में प्रदर्शित किया गया था। जनपथ पर वर्तमान भवन 18 दिसंबर 1960 को खोला गया था।

शनिवार, 24 दिसंबर 2022

25 दिसम्बर मनुस्मृति दहन दिवस-

25 दिसम्बर मनुस्मृति दहन दिवस-

मनुस्मृति और मनु ने भारतीय सामाजिक व्यवस्था का बेड़ा गर्क किया........



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25 दिसम्बर 1927 को बाबा साहब डा भीम राव अम्बेडकर जी ने हिन्दू धर्म के कथित कानून की किताब "मनुस्मृति" को सार्वजनिक तौर पर जलाने का काम किया था क्योकि इस मनुस्मृति के जरिये इस देश की 85 प्रतिशत आबादी को हजारों वर्षों तक पशुवत हांकने व ताड़ने का काम मनुवादियों द्वारा किया जाता रहा है।

       आज 25 दिसम्बर है।आज के दिन की प्रासंगिकता और भी बलवती हो जाती है क्योंकि आज भले ही बाबा साहब द्वारा लिखित भारतीय संविधान कार्यरूप में है लेकिन जिन लोगो को इसे क्रियान्वित करना है उनकी जेहन में आज भी मनुस्मृति के विकार भरे पड़े हैं।बाबा साहबने भी कहा था कि कानून चाहे जितना बेहतर हो लेकिन वह निर्भर उसको लागू करने वाले के नियत व सोच पर करेगा।

       बाबा साहब ने जिस मनुस्मृति को जलाया था वह आज के दौर में फीनिक्स की तरह जलने के बाद एक बार फिर जीवंत हो उठी है।हम सबको नए सिरे से मनुस्मृति व मनुवाद से लड़ने के लिए तैयार होना होगा।

      बाबा साहब डा भीम राव अम्बेडकर जी द्वारा 25 दिसम्बर 1927 को अंग्रेजी राज में मनुस्मृति जलाने के बाद देश की आजादी के 31 वर्ष बाद पुनः 14 अप्रैल 1978 से 30 अप्रैल 1978 के बीच अर्जक संघ ने महामना रामस्वरुप वर्मा जी के आह्वान व नेतृत्व में मनुस्मृति व रामायण का दहन किया था।आज पुनः मनुस्मृतिनुसार देश में राज करने की प्रबृत्ति सिर उठा रही है जिससे सभी पढ़े-लिखे समतावादियों को संघर्ष करना होगा।

       25 दिसम्बर मनुस्मृति दहन दिवस के बारे में जानने के बाद जब पत्नी सीता भूषण यादव जी द्वारा इस मनुस्मृति के सम्बंध में तफसील से जानने की जिज्ञासा प्रकट की गई तो मैने उन्हें तीन भिन्न-भिन्न प्रकाशनों द्वारा प्रकाशित "मनुस्मृति" सुपुर्द कर दी और उन्हें मोटामोटी मनुस्मृति के मुतल्लिक जानकारियां दे दी जिनमें कुछ प्रमुख

मनुस्मृति के भेदभावपूर्ण विधान निम्नवत हैं-

★जिस देश का राजा शूद्र अर्थात पिछड़े वर्ग का हो, उस देश में ब्राह्मण निवास न करें क्योंकि शूद्रों को राजा बनने का अधिकार नही है।

★राजा प्रातःकाल उठकर तीनों वेदों के ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करें।

★जिस राजा के यहाँ शूद्र न्यायाधीश होता है उस राजा का देश कीचड़ में धँसी हुई गाय की भांति दुःख पाता है।

★ब्राह्मण की सम्पत्ति राजा द्वारा कभी भी नही ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, मर्यादा है, लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है।

★नीच वर्ण का जो मनुष्य अपने से ऊँचे वर्ण के मनुष्य की वृत्ति को लोभवश ग्रहण कर जीविका यापन करे तो राजा उसकी सब सम्पत्ति छीनकर उसे तत्काल निष्कासित कर दे।

★ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है। इसके अतिरक्त वह शूद्र जो कुछ करता है , उसका कर्म निष्फल होता है।

★यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देता है तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि वह ब्रह्मा के निम्नतम अंग से पैदा हुआ है।

★यदि शूद्र तिरस्कार पूर्वक उनके नाम और वर्ण का उच्चारण करता है, जैसे वह यह कहे देवदत्त तू नीच ब्राह्मण है, तब दश अंगुल लम्बी लोहे की छड़ उसके मुख में कील दी जाए।

★निम्न कुल में पैदा कोई भी व्यक्ति यदि अपने से श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति के साथ मारपीट करे और उसे क्षति पहुंचाए, तब उसका क्षति के अनुपात में अंग कटवा दिया जाए।

★ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक मात्र कर्म निश्चित किया है, वह है– गुणगान करते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना।

★शूद्र यदि ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे, तब राजा उसकी पीठ को तपाए गए लोहे से दगबा कर अपने राज्य से निष्कासित कर दे।

★यदि शूद्र गर्व से ब्राह्मण पर थूक दे तब राजा दोनों ओंठों पर पेशाब कर दे तब उसके लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे।

★यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए, तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर शूद्र गुस्से में ब्राह्मण को लात से मारे, तब उसका पैर कटवा दिया जाए।

★इस पृथ्वी पर ब्राह्मण वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नही है। अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी लाए।

★शूद्र यदि अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश करे तो उस शूद्र के मुँह और कान में राजा गर्म तेल डलवा दें।

★राजा बड़ी बड़ी दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञ करें और धर्म के लिए ब्राह्मणों को स्त्री, गृह शय्या, वाहन आदि भोग साधक पदार्थ तथा धन दे।

★जानबूझ कर क्रोध से यदि शूद्र ब्राह्मण को एक तिनके से भी मारता है, वह 21 जन्मों तक कुत्ते बिल्ली आदि पाप श्रेणियों में जन्म लेता है।

★ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है।

★शूद्र को भोजन के लिए झूठा अन्न, पहनने को पुराने वस्त्र, बिछाने के लिए धान का पुआल और फ़टे पुराने वस्त्र देना चाहिए।

★बिल्ली, नेवला, नीलकण्ठ, मेंढक, कुत्ता, गोह, उल्लू, कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है।

★शूद्र लोग बस्ती के बीच में मकान नही बना सकते। गांव या नगर के समीप किसी वृक्ष के नीचे अथवा श्मशान पहाड़ या उपवन के पास बसकर अपने कर्मों द्वारा जीविका चलावें।

★ब्राह्मण को चाहिए कि वह शूद्र का धन बिना किसी संकोच के छीन लेवे क्योंकि शूद्र का उसका अपना कुछ नही है। उसका धन उसके मालिक ब्राह्मण को छीनने योग्य है।

★धन संचय करने में समर्थ होता हुआ भी शूद्र धन का संग्रह न करें क्योंकि धन पाकर शूद्र ब्राह्मण को ही सताता है।

★राजा वैश्यों और शूद्रों को अपना अपना कार्य करने के लिए बाध्य करने के बारे में सावधान रहें , क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्य से विचलित हो जाते हैं तब वे इस संसार को अव्यवस्थित कर देते हैं।

★शूद्रों का धन कुत्ता और गदहा ही है। मुर्दों से उतरे हुए इनके वस्त्र हैं। शूद्र टूटे फूटे बर्तनों में भोजन करें। शूद्र महिलाएं लोहे के ही गहने पहने।

★यदि यज्ञ अपूर्ण रह जाये तो वैश्य की असमर्थता में शूद्र का धन यज्ञ करने के लिए छीन लेना चाहिए।

★दूसरे ग्रामवासी पुरुष जो पतित , चाण्डाल , मूर्ख , धोबी आदि अंत्यवासी हो उनके साथ द्विज न रहें। लोहार , निषाद , नट , गायक के अतिरिक्त सुनार और शस्त्र बेचने वाले का अन्न वर्जित है।

★शूद्रों के समय कोई भी ब्राह्मण वेदाध्ययन में कोई सम्बन्ध नही रखें , चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए।

★स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नही होता। यह शास्त्र द्वारा निश्चित है। अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं, वे पापयुक्त हैं और असत्य के समान अपवित्र हैं, यह शाश्वत नियम है।

★अतिथि के रूप में वैश्य या शूद्र के आने पर ब्राह्मण उस पर दया प्रदर्शित करता हुआ अपने नौकरों के साथ भोज कराये।

★शूद्रों को बुद्धि नही देना चाहिए अर्थात उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नही है। शूद्रों को धर्म और व्रत का उपदेश न करें।

★जिस प्रकार शास्त्रविधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि, दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं, उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है।

★शूद्र की उपस्थिति में वेद पाठ नही करना चाहिए। ब्राह्मण का नाम शुभ और आदर सूचक, क्षत्रिय का नाम वीरता सूचक, वैश्य का नाम सम्पत्ति सूचक और शूद्र का नाम तिरस्कार सूचक हो।

★दस वर्ष के ब्राह्मण को 90 वर्ष का क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पिता समान समझ कर उसे प्रणाम करे।

       बाबा साहब डा भीम राव अम्बेडकर जी को कोटिशः नमन कि उन्होंने 20 वीं सदी में देश में अकेले ही मनुवाद के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजा दिया था।मनुस्मृति दहन दिवस पर आप सभी को जय भीम!जय भारत!जय संविधान!

-चन्द्रभूषण सिंह यादव

(25 दिसम्बर 2021) 


दक्षिण भारत में आज जोरशोर सेई.वी. रामास्वामी यानि पेरियारका जन्मदिन मनाया जा रहा है. पेरियार ने ताजिंदगी हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद का जमकर विरोध किया. उन्होंने तर्कवाद, आत्म सम्मान और महिला अधिकार जैसे मुद्दों पर जोर दिया. जाति प्रथा का घोर विरोध किया. यूनेस्को ने अपने उद्धरण में उन्हें ‘नए युग का पैगम्बर, दक्षिण पूर्व एशिया का सुकरात, समाज सुधार आन्दोलन का पिता, अज्ञानता, अंधविश्वास और बेकार के रीति-रिवाज़ का दुश्मन’ कहा. पढ़िए उनकी वो पंद्रह बातें, जिनसे विवाद हुआ.

1. मैंने सब कुछ किया. मैंने गणेश आदि सभी ब्राह्मण देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ डालीं. राम आदि की तस्वीरें भी जला दीं. मेरे इन कामों के बाद भी मेरी सभाओं में मेरे भाषण सुनने के लिए यदि हजारों की गिनती में लोग इकट्ठा होते हैं तो साफ है कि 'स्वाभिमान तथा बुद्धि का अनुभव होना जनता में, जागृति का सन्देश है.'

2. दुनिया के सभी संगठित धर्मो से मुझे सख्त नफरत है.

3. शास्त्र, पुराण और उनमें दर्ज देवी-देवताओं में मेरी कोई आस्था नहीं है, क्योंकि वो सारे के सारे दोषी हैं. मैं जनता से उन्हें जलाने तथा नष्ट करने की अपील करता हूं.

4. 'द्रविड़ कड़गम आंदोलन' का क्या मतलब है? इसका केवल एक ही निशाना है कि, इस आर्य ब्राह्मणवादी और वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना, जिसके कारण समाज ऊंच और नीच जातियों में बांटा गया है. द्रविड़ कड़गम आंदोलन उन सभी शास्त्रों, पुराणों और देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखता, जो वर्ण तथा जाति व्यवस्था को जैसे का तैसा बनाए रखे हैं.

periyar

5. ब्राह्मण हमें अंधविश्वास में निष्ठा रखने के लिए तैयार करता है. वो खुद आरामदायक जीवन जी रहा है. तुम्हे अछूत कहकर निंदा करता है. मैं आपको सावधान करता हूं कि उनका विश्वास मत करो.

6. ब्राह्मणों ने हमें शास्त्रों ओर पुराणों की सहायता से गुलाम बनाया है. अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंदिर, ईश्वर,और देवी-देवताओं की रचना की.

7. सभी मनुष्य समान रूप से पैदा हुए हैं तो फिर अकेले ब्राह्मण उच्च व अन्य को नीच कैसे ठहराया जा सकता है?

8. आप अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई क्यों इन मंदिरों में लुटाते हो. क्या कभी ब्राह्मणों ने इन मंदिरों, तालाबों या अन्य परोपकारी संस्थाओं के लिए एक रुपया भी दान दिया?

9. हमारे देश को आजादी तभी मिली समझनी चाहिए, जब ग्रामीण लोग, देवता ,अधर्म, जाति और अंधविश्वास से छुटकारा पा जाएंगे.

10. आज विदेशी लोग दूसरे ग्रहों पर संदेश और अंतरिक्ष यान भेज रहे हैं. हम ब्राह्मणों द्वारा श्राद्धों में परलोक में बसे अपने पूर्वजों को चावल और खीर भेज रहे हैं. क्या ये बुद्धिमानी है?

11. ईश्वर की सत्ता स्वीकारने में किसी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन नास्तिकता के लिए बड़े साहस और दृढ विश्वास की जरुरत पड़ती है. ये स्थिति उन्हीं के लिए संभव है जिनके पास तर्क तथा बुद्धि की शक्ति हो.

12. ब्राह्मणों के पैरों पर क्यों गिरना? क्या ये मंदिर हैं? क्या ये त्यौहार हैं? नही , ये सब कुछ भी नही हैं. हमें बुद्धिमान व्यक्ति कि तरह व्यवहार करना चाहिए यही प्रार्थना का सार है.|

13. ब्राह्मण देवी-देवताओं को देखो, एक देवता तो हाथ में भाला/ त्रिशूल उठाकर खड़ा है. दूसरा धनुष बाण. अन्य दूसरे देवी-देवता कोई गुर्ज, खंजर और ढाल के साथ सुशोभित हैं, यह सब क्यों है? एक देवता तो हमेशा अपनी ऊँगली के ऊपर चारों तरफ चक्कर चलाता रहता है, यह किसको मारने के लिए है?

14. हम आजकल के समय में रह रहे हैं. क्या ये वर्तमान समय इन देवी-देवताओं के लिए सही नहीं है? क्या वे अपने आप को आधुनिक हथियारों से लैस करने और धनुषवान के स्थान पर , मशीन या बंदूक धारण क्यों नहीं करते? रथ को छोड़कर क्या श्रीकृष्ण टैंक पर सवार नहीं हो सकते? मैं पूछता हूँ कि जनता इस परमाणु युग में इन देवी-देवताओं के ऊपर विश्वास करते हुए क्यों नहीं शर्माती?

15. उन देवताओ को नष्ट कर दो जो तुम्हें शुद्र कहे, उन पुराणों और इतिहास को ध्वस्त कर दो, जो देवता को शक्ति प्रदान करते हैं. उस देवता की पूजा करो जो वास्तव में दयालु भला और बौद्धगम्य है.|

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

हिन्दू धर्म(ब्राह्मण धर्म) का खूॅटा-


यादव शक्ति पत्रिका ने हिंदू धर्म में कुल 5 खूंटों का जिक्र किया है। आप लोग भी पढ़िए क्या हैं हिंदू धर्म के 5 खूंटे..
जिनसे ब्राह्मणों ने सभी दलितों और पिछड़ों को बांध रखा है..
हिन्दू धर्म(ब्राह्मण धर्म) का खूॅटा-
पहला खूॅटा- ब्राह्मण:-- 

हिन्दू धर्म में ब्राह्मम जन्मजात श्रेष्ठ है चाहे चरित्रसे वह कितना भी खराब क्यों न हो।
हिन्दू धर्म में उसके बिना कोई भी मांगलिक कार्य हो ही नहींसकता।
किसी का विवाह करना हो तो दिन तारीख बताएगा ब्राह्मण।
किसी को नया घर बनाना हो तो भूमिपूजन करायेगा ब्राह्मण।
किसी के घर बच्चा पैदा हो तो नाम- राशि बतायेगा ब्राह्मण।
किसी की मृत्यु हो जाय तो क्रियाकर्म करायेगा, भोज खायेगा ब्राह्मण।
बिना ब्राह्मण से पूछे
हिन्दू हिलने की स्थिति में नहीं है।
इतनी मानसिक गुलामी में जी रहे हिन्दू से विवेक की कोई बात करने पर वह सुनने को भी तैयार नहीं होता।
पिछडों /एससीके आरक्षण का विरोध करता है ब्राह्मण।
पिछड़ों /एससी की शिक्षा,रोजगार,सम्मान का विरोध करता है ब्राह्मण।
इतना के बावजूद भी वह पिछड़ों /एससी का प्रिय और अनिवार्य बना हुआ है क्यों? घोर आश्चर्य।
हिन्दू ब्राह्मण रूपी खूॅटा से बॅधा हुआ है।
दूसरा खूॅटा -ब्राह्मण शास्त्र:-
यह जहरीले साॅप की तरह हिन्दू समाज के लिए जानलेवा है।
मनुस्मृति जहरीली पुस्तक है।
वेद ,पुराण ,रामायण आदि में भेद-भाव ,ऊॅच-नीच, छूत- अछूत का वर्णन मनुष्य- मनुष्य में किया गया है।
ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण,
भुजा से क्षत्रिय,
जंघा से वैश्य ,
पैर से शूद्र की उत्पत्ति बताकर शोषण -दमन की व्यवस्था शास्त्रों में की गयी है।
हिन्दू-शास्त्रों मे स्त्री को गिरवी रखा जा सकता है,
बेचा जा सकता है,
उधार भी दिया जा सकता है।
हिन्दू समाज इन
शास्त्रों से संचालित होता रहा है।
तीसरा खूॅटा--हिन्दू धर्म के पर्व/त्योहार:-
इसका मतलब आर्यों द्वारा इस देश के एससी/पिछड़ों (मूलवासियों) की की गयी निर्मम हत्या पर मनाया गया जश्न।
आर्यों ने जब भी और जहाॅ भी मूलवासियों पर विजय हासिल की ,विजय की खुशी में यज्ञ किया।
यही पर्व कहा गया।
पर्व ब्राह्मणों की विजय और त्योहार मूलवासियों के हार की पहचान है।
त्योहार का मतलब होता है-तुम्हारी हार यानी मूलवासियों की हार।
इस देश के मूलवासी अनभिज्ञता की वजह से
पर्व-त्योहार मनाते हैं।
न किसी को अपने इतिहास का ज्ञान है और न अपमान का बोध।
सबके सब ब्राह्मणवाद के खूॅटे से बॅधे हैं।
अपना मान -सम्मान और इतिहास सब कुछ खो दिया है।
अपने ही अपमान और विनाश का उत्सव मनाते हैं और शत्रुओं को सम्मान और धन देते हैं।
यह चिन्तन का विषय है।
होली , होलिका की हत्या और बलात्कार का त्योहार।
दशहरा - दीपावली-रावण वधका त्योहार।
नवरात्र-महिषासुर वध का त्योहार।
किसी धर्म में त्योहार पर शराब पीना और जुआ खेलना वर्जित है ।
पर हिन्दू धर्म में होली में शराबऔर दीपावली पर जुआ खेलना धर्म है।
हिन्दू समाज इस खूॅटे से पुरी तरह बॅधा है।
चौथा खूॅटा- देवी -देवता-

-हिन्दू धर्म में तैंतीस करोड़ देवी-देवता बताये गये हैं।
पाप-पुण्य ,जन्म-मरण,
स्वर्ग -नरक, पुनर्जन्म,प्रारब्ध का भय बताकर
काल्पनिक देवी-देवताओं की पूजा -आराधना का विधान किया गयाहै।
मन्दिर -मूर्ति ,पूजा,
दान- दक्षिणा देना अनिवार्य बताया गया है।
हिन्दू समाज इस खूॅटे से बॅधा हुआ है और पाखण,अंधविश्वास,अंधश्रद्धा से जकड़ा है।
पाॅचवां खूॅटा-तीर्थस्थान:-
-ब्राह्मणों ने देश के चारों ओर तीर्थस्थान के हजारों खूॅटे गाड़ रखे हैं।
इन तीर्थस्थानों के खूॅटे से टकराकर मरना पुण्य और स्वर्ग प्राप्ति का सोपान बताया गया है।
हिन्दू समाज के इन खूटों से टकराकर मरने की घटनायें प्रायः होती रहती हैं और जान माल का नुकसान होता है।

ब्राह्मणवाद के इन खूॅटो को उखाड़ने के लिए
चिन्तन- मनन, विचार-विमर्श करना होगा।
किसी भी मांगलिक कार्य में ब्राह्मण को न बुलाने से,
ब्राह्मणशास्त्रों को न पढ़ने,
न मानने से,
हिन्दू (ब्राह्मण)त्योहारों को
न मनानेसे,
काल्पनिक हिन्दू देवी-देवताओं को न मानने,
न पूजने से,
तीर्थस्थानों में न जाने,
दान -दक्षिणा न देने से ब्राह्मणवाद के सभी खूॅटे उखड़ सकते हैं।
ब्राह्मणवाद से समाज
मुक्त हो सकता है और मानववाद विकसित हो सकता है।
इस पर चिन्तन-मनन करने की आवश्यकता है।
आइए ब्राह्मणवाद से मुक्ति और मानववाद को विकसित करने का सकल्प लें।


साभार-
यादव शक्ति पत्रिका..